हर प्रदेश में किसी न किसी राजनीतिक दल की सरकार होती है। सरकार में सीएम से लेकर मंत्री तक होते हैं। सबके अपने परंपरागत सच्चाई जानने के तरीके होते हैं।कहीं अधिकारियों के जरिए लोगों की तकलीफ को जानने का प्रयास किया जाता है और तकलीफ दूर की जाती है।कहीं सीएम कुछ महीनों मे लोगों से मिलते हैं और उनकी समस्याओं को जानकर दूर करने का प्रयास करते हैं, कहीं शिविर लगाए जाते हैं और विभागों के अधिकारी लोगों की समस्या,तकलीफ दूर करते हैं, मांगें पूरी करते हैं। कहीं एक माह तक शिविरों का आयोजन गांवों में लोगों की समस्याओं को जानने व दूर करने का प्रयास किया जाता है। इससे लोगों की समस्याओं का पता चलता है,योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं मिल रहा है,पता चलता है। किसी क्षेत्र में जनता क्या सुधार चाहती है पता चलता है। डिजि़टल युग में तो पीएम से लेकर सीएम तक का अपना एप है,अपनी हेल्पलाइन जहां लोग अपनी शिकायत करते हैं और उनकी शिकायतों पर कार्रवाई भी होती है।
सीएम जब सीएम के रूप में लोगों के बीच जाते हैं,मंत्री जब मंत्री के बीच लोगों के बीच जाते हैं तो लोग उनको समस्याएं बताते हैं लेकिन बहुत सारी समस्याएं नहीं बताते हैं,यह वह समस्याएं होती हैं,वह तकलीफ होती है, वह परेशानी होती है जो छोटी होती है जो लोगों को रोज होती है।इनका पता तो सीएम व मंत्री को तब ही लग सकता है जब वह लोगों के बीच आम आदमी की तरह घूमे।आम आदमी की तरह किसी बस में सफर करे, किसी आटो में सफर करे। जैसे कर्नाटक के परिवहन मंत्री बैरत सुरेश ने किया।वह आम लोगों के भेष में बेंगलुरू महानगर परिवहन निगम की सेवाओं को जानने को निकले।दो घंटे में दस से अधिक बसों में सफर किया। इस दौरान उनको वही परेशानियां झेलनी पड़ी जो आम लोगों को रोज झेलनी पड़ती है।कहीं उनको कंडक्टर ने चिल्हर न होने पर उतरने को कह दिया तो उतर गए।कहीं आटोचालक ने मीटर से ज्यादा किराया मांगा तो दिया।उन्होंने बस में बैठे बैठे देखा कि एक बस चालक ने तो बस स्टाप पर बस नहीं रोकी। एक बस स्टाप में खड़े यात्री बस को रुकने का इशारा किया तो बस नहीं रोकी गई।
मंत्री ने शाम ७ बजे से ९ बजे तक दो घंटे में बसों में यात्रा की,इस दौरान उन्होंने अपने मंत्री होने की पहचान को छिपाए रखा, न यात्रियों को पता चला न बस के कर्मचारियों को पता चला.किसी को पता नहीं चला कि उनके साथ राज्य का परिवहन मंत्री सफर कर रहा है। एक बस में उन्होंने टिकट के लिए सौ रुपए दिए,कंडक्टर ने छुट्टे पैसे मांगे,मंत्री ने कहा कि मेरे पास छुट्टे पैसे नहीं है तो कंडक्टर ने भी अपने बैग को दिखाते हुए कहा कि मेरे पास भी नहीं है,साथ ही यह भी कहा कि बस किराया के लिए छुट्टा पैसा नहीं है तो आप बस से उतर जाइए।मंत्री चाहते तो यहां पर दूसरे मंत्रियों की तरह एक मंत्री का अपमान कर रहे हो कह अपनी पहचान जरूर बताते।लेकिन वह आम लोगों की तरह बस से उतर गए।बाद जिस बस के चालक,कंडक्टर ने जो भी गलत किया था,अधिकारियों को कहकर सबके खिलाफ कार्रवाई की गई।उनको यह भी बताया गया कि यह कार्रवाई उनके खिलाफ क्यों की गई है।ताकि वह सचेत रहे कि उनके बस में कभी मंत्री भी सफर कर सकता है और बुरा व्यवहार करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है।
इसी तरह तमिलनाडु में एक मंत्री वही काम किया जो कई राज्यों में मंत्री,अधिकारी करते हैं और राज्य के सीएम विजय ने जो किया वह भी राज्य के सीएम लोगों को करना चाहिए। यानी मंत्री यदि गलत करते हैं तो उनको सीएम को एहसास दिलाया जाना चाहिए कि आपने गलत किया है और ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि कोई मंत्री फिर से वैसी गलती न करे।तमिलनाडु में उद्योग मंत्री एम कीर्तना विरुधुनगर के एक स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे।उन्होंने एक छात्रा से अंग्रेजी में सवाल पूछा,छात्रा जवाब नहीं दे पाई तो मंत्री ने उनको डांटा। इस घटना का वीडियो वायरल हुआ तो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं सहित लोगों ने मंत्री की आलोचना की ।मंत्री ने अंग्रेजी में जवाब न देने के लिए छात्रा को डांट दिया, उन्होंने माना यह छात्रा की गलती है,हकीकत में इसके लिए तो स्कूल के प्रिसिंपल व शिक्षकों को डांट पड़नी थी कि वह कैसी पढ़ाई कराते हैं कि छात्रा अंग्रेजी में जवाब नहीं दे सकती।अक्सर ऐसा होता है कि अधिकारी व मंत्री कहीं भी निरीक्षण करने जाते हैं और किसी न किसी को डांटते हैं,फटकार लगाते हैं। वह जानने का प्रयास नहीं करते हैं ऐसा है तो क्याें है, और इसके लिए दोषी कौन है।जरूरी नहीं है कि जो सामने हैं,वही दोषी हो।
इसके बाद तमिलनाडु के सीएम विजय ने जो किया वह दूसरे राज्यों के सीएम के लिए एक उदाहरण है कि अगर आपके मंत्री ने कोई गलती की है तो उसका पक्ष मत लीजिए क्योंकि पक्ष लेने पर वह मंत्री फिर से वही गलती कर सकता है, अपने मंत्री होने की धौंस फिर किसी छात्रा,आम नागरिक, किसी अधिकारी को दिखा सकता है। हर राज्य के मंत्री अपने मंत्री होने का रौब तो दिखाते ही है।तमिलनाड़ु में फिर कोई मंत्री का सत्तारूढ़ दल का कोई नेता या कार्यकर्ता किसी स्कूल में ऐसा न कर सके इसलिए तमिलनाडु के सीएम ने स्कूलों में राजनीतिक कार्यक्रमों, पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं के प्रवेश पर रोक लगा दी है। राज्य में एक सर्कुलर जारी कर साफ कर दिया गया है कि स्कूलों में अब सिर्फ शैक्षणिक गतिविधियां होंगी।दो राज्यों के दो उदाहरण हैं कि कभी कभी सीएम व मंत्री को ऐसा काम भी करना चाहिए ताकि वह एक मिसाल कायम कर सकें।
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