भाजपा में बड़े नेताओं को समझा दिया जाता है कि...

Posted On:- 2026-07-12




सुनील दास

राजनीति ही नहीं हर क्षेत्र में अक्सर सारे फैसले ताकतवर करता है क्योंकि उसके पास फैसले करने की ताकत होती है।किसी भी पार्टी का नेतृत्व जितना ताकतवर होता है,उसके फैसले उतने ही मजबूत होते हैं यानी एक बार फैसला हो गया तो फिर वह फैसला किसी भी तरह से कोई नीचे के नेता नहीं बदल सकता। यदि एक बार दिल्ली के नेता फैसला कर लिया तो उस फैसले का विरोध प्रदेश का कोई नेता अप्रत्यक्ष रूप से अपने समर्थकों के जरिए करवा सकता है लेकिन उसे बदलवा नहीं सकता क्योंकि वह फैसला केंद्रीय नेतृत्व का है और केंद्रीय नेतृत्व उससे ज्यादा ताकतवर है,उसके खिलाफ अऩशासनहीनता करने पर कार्रवाई की जा सकती है। उसे नोटिस दिया जा सकता है, उसे पार्टी से निकाला जा सकता है।प्रदेश का नेता यदि अपने क्षेत्र में ताकतवर है तो उसकी बात सुनी व मानी जाती है क्योंकि वह अपनी ताकत से नेतृत्व को बता सकता है कि यदि मेरी बात नहीं मानी या सुनी गई तो मैं पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता हूं। चुनाव में मुझे टिकट नहीं दी गई तो मैं पार्टी प्रत्याशी को हरा सकता हूं। भाजपा हो या कांग्रेस ऐसा कई बार होता है जब प्रदेश का कोई बड़ा नेता जैसा चाहता है वैसा पार्टी नहीं करती है।

बड़े नेता तो हर पार्टी में होते हैं, हर पार्टी में कुछ नेता खुद को बड़ा नेता मानते हैं। पार्टी के नेतृत्व मजबूत होता है तो वह प्रदेश के ऐसे बड़े नेता को समझा देता है कि बड़े तुम नहीं हो, बड़ा मैं हूं और पार्टी में रहना है तो मुझे बड़ा मानना होगा, मेरा फैसला मानना होगा।जब पार्टी कई राज्यों में चुनाव जीतती है और सरकार बनाने में सफल रहती है तो पार्टी नेतृत्व मजबूत होता है, वह मजबूत फैसले कर सकता है और उसके फैसले को राज्यों में मानना पड़ता है। जैसे नरोत्तम मिश्रा मप्र भाजपा के बड़े नेता है, वह भाजपा सरकार में गृहमंत्री रहे हैं,पिछला चुनाव हार गए,इसके बाद भी वह खुद को बड़ा नेता समझते हैं तो इससे पार्टी को कोई दिक्कत नहीं थी, पार्टी को दिक्कत तो तब हुई जब पार्टी के फैसले का विरोध कर खुद को पार्टी से बड़ा नेता बताने का प्रयास किया। वह चाहते थे कि दतिया उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी उनको बनाया जाए। पार्टी ने उनको प्रत्याशी न बनाकर किसी दूसरे को बना दिया। नरोत्तम मिश्रा खुद तो सामने आकर विरोध नहीं कर सकते थे,उनके समर्थक विरोध कर सकते और उन्होंने खूब बवाल काटा और पार्टी के बताने की कोशिश की वह फैसले का विरोध करते है।वह चाहते हैं कि पार्टी अपना फैसला बदले।

ऐसे में पार्टी नेतृत्व के लिए जरूरी हो गया था यह बताना कि कोई नेता या कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन करके पार्टी के फैसले को नहीं बदल सकता। पार्टी किसी नेता या उनके कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण अपने फैसले नहीं बदल सकती।ऐसे में पार्टी नेतृत्व ने नरोत्तम मिश्रा को भाेपाल बुलाकर समझा दिया कि वह मप्र के बड़े नेता होंगे,लेकिन इतने बड़े नेता नहीं है कि वह पार्टी को फैसला बदलने के लिए मजबूर कर सकें। पार्टी का फैसला तो उनको मानना पड़ेगा और नरोत्तम मिश्रा को भोपाल मे कहना पड़ा कि वह पार्टी के फैसले से नाराज नहीं है नही उन्होंने प्रत्याशी बदलने की मांग की है। उनको भोपाल बुलाकर कहा गया है कि आपको भाजपा प्रत्याशी की जीत के लिए काम करना है। पार्टी ने कहा कि वह कार्यकर्ताओं को मनाना आपका काम है, पार्टी कार्यकर्ताओं ने जो किया गलत किया है।चुनाव हारने पर जिस नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि मेरा पानी उतरता देख किनारे पर घर  मत बना लेना,मैं समंदर हूं लौट कर आऊंगा। बताया जाता है कि टिकट कटने पर उन्होंने कहा है कि अब किनारे पर जो चाहे अपना घर बना सकता हैं।

ज्ञात हो कि नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने पर उनके समर्थकों ने दतिया मे रात भर और शनिवार दोपहर तक बवाल काटा।भाजपा दफ्तर को बंधक बना लिया,हाईवे जाम कर दिया,पथराव किया जिससे कई पुलिस वाले घायल हो गए।मामला दिल्ली तक पहुंचा क्योंकि ऐसा भाजपा के किसी समर्थकों ने आज तक नहीं किया था,आम धारणा है कि भाजपा कार्यकर्ता  पार्टी का अनुशासन माननेे वाले हैं। पार्टी का फैसला मानने वाले होते हैं।दिल्ली में इस तरह के बवाल को गंभीरता से लेना ही था और लिया भी गया है ।नरोत्तम मिश्रा को ही कह दिया गया है कि पार्टी कार्यकर्ताओं को समझाना उनकी जिम्मेदारी है। यह ठीक है कि भाजपा में पार्टी कार्यकर्ताओं की बात सुनी जाती है, उनका सम्मान है,लेकिन पार्टी के फैसलों का विरोध किसी नेता के समर्थक करें तो इसे सहन पहले भी नहीं किया गया है और आगे भी नहीं किया जाएगा।दिल्ली से यह संदेश ऐसे तमाम खुद को बड़े नेता मानने वाले नेताओं को दे दिया गया है।

भाजपा में पार्टी सबसे बड़ी होती है, पार्टी से बड़ा कोई नेता नहीं होता है।पार्टी के कारण ही कोई नेता या बड़ा नेता होता है।किसी नेता के कारण पार्टी बड़ी नहीं होती है। यही वजह है कि भाजपा में एक बार फैसला हो गया तो उसे बदलने की कोशिश कोई नहीं करता है क्योंकि जानते हैं कि उसे बदला नहीं जा सकता।कोई बड़ा नेता उसे कार्यकर्ताओं के विरोध के नाम पर नही बदलवा सकता। नरोत्तम मिश्रा ने मप्र में कोशिश की और उनको बता दिया गया है कि आपने गलत किया है। कांग्रेस में निरंतर कई चुनाव हारने के कारण आलाकमान कमजोर हुआ है तो राज्यो में नेता उनके फैसले का विरोध कर रहे हैं। केरल से शुरु हुआ विरोध अब पंजाब में भी दिख रहा है।पंजाब में आलाकमान ने राजा वडिंग को अध्यक्ष बनाया है तो उसका विरोध राज्य के एक गुट के नेता कर रहे हैं और बदलने की मांग कर रहे हैं।आलाकमान के आदेश पर कांग्रेस कोई सख्त कदम नहीं उठा पा रही है, कई दिनों से समझाने का काम चल रहा है।आलाकमान का फैसला अंतिम है लेकिन अध्यक्ष का विरोध जारी है। 



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