किसी के नियम से किसी को परेशानी न हो तो अच्छा है

Posted On:- 2026-09-10




सुनील दास

किसी परिवार,किसी समाज,किसी संप्रदाय और किसी देश के कानून एक व्यवस्था के लिए बनाए जाते हैं,उसका मकसद किसी को परेशान नहीं करना होता है।लेकिन दूसरों को किसी के नियम से परेशानी तो हो सकती है जब वह अपने दायरे से बाहर लागू करने का प्रयास किया जाता है। हर नियम कानून का एक दायरा होता है।जहां उसको जानने वाले होते हैं, मानने वाले होते हैं,वहां किसी को कोई परेशानी नहीं होती है।लेकिन जब भी किसी नियम को दायरे के बाहर जहां उसको जानने वाले,मानने वाले नहीं होते हैं,लागू कराने का प्रयास होता है तो वहां के लोगों को परेशानी होना स्वाभाविक है,यह मानना स्वाभाविक है कि हमारे साथ अपने नियम के अनुसार यह जो व्यवहार किया गया वह तो हमारे नियम कानून के हिसाब से उचित नहीं है।किसी संप्रदाय के नियम कितने साल सौ साल भी पुराने  हों, पुराने होने के कारण वह सभी के लिए पालन योग्य नहीं हो जाते हैं। कितने भी पुराने होने के बावजूद उनका पालन वहीं किया और कराया जाना चाहिए जहां उनके पालन करने या कराने से किसी को परेशानी नहीं होती है।
स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों ने अपने नियम को पेरिस के एफिल टॉवर में लागू करने का प्रयास किया।फ्रांस में संप्रदाय के मंदिर के उद्घाटन पर संप्रदाय के संत वहां पहुंचे थे। उद्घाटन के बाद इनकी इच्छा एफिल ट़ॉवर देखने की हुई और उन्होने एफिल टॉवर को संचालित करने वाले कंपनी से आग्रह किया उनके एफिल टावर देखने के दौरान टॉवर में महिलाएं न हों।हालांकि संतों ने किसी को अपमान करने,किसी को परेशान करने के लिए ऐसा नहीं किया लेकिन फ्रांस में महिलाओं से संबंधित दूसरे नियम होने के कारण इसे लिंगभेद माना गया और विरोध में एफिल टॉवर के १३७ साल के इतिहास में पहली बार एफिल टॉवर बंद रहा।टॉवर को संचालित करने वाली कंपनी कंपनी ने माना कि संतों ने महिलाओं से संपर्क सीमित करने का अनुरोध किया था।यह बात नहीं मानी जानी थी।मान ली गई और जो विवाद कभी नहीं हुआ वह हो गया।
इस घटनाक्रम के बाद फ्रांस के साथ ही भारत में धार्मिक स्वतंत्रता,सांस्कृतिक सम्मान,लैंगिक समानता को लेकर बहस शुरू हो गई है।स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों के लिए महिला से दूरी रखने के नियम २०० साल से भी पुराना है लेकिन आज तक इस तरह की घटना कभी नहीं हुई जैसी घटना फ्रास के पेरिस में हुई।
बताया जाता है कि भगवान स्वामीनारायण ने १९ वीं सदी की शुरुआत में अपने संतों के लिए कुछ नियम बनाए थे।इसमें संतों के लिए जो ब्रम्हचर्य के लिए जो नियम बनाए गए थे,वह बहुत ही कड़े थे।उन्हें अष्ट प्रकार का ब्रम्हचर्य कहा जाता है।यह संतों के लिए अलग है और गृहस्थ भक्तों के लिए अलग है।संतों के लिए स्मरण का नियम है कि वह स्त्री का मानसिक रूप से स्मरण नहीं कर सकते,कीर्तन यानी स्त्री के रूप,सुंदरता,गुणों की चर्चा नहीं कर सकते,केली यानी स्त्री के साथ किसी प्रकार का आमोद प्रमोद नही कर सकते,प्रेक्षण यानी स्त्री को कामुक दृष्टि या ध्यान से नहीं देख सकते,गुह्य भाषण यानी एकांत में स्त्री से बात नहीं कर सकते,संकल्प यानी मन से भी कभी स्त्री संग का विचार या संकल्प नहीं कर सकते,अध्यवसाय यानी स्त्री सुख प्राप्त करने का निश्चय नहीं कर सकते,क्रिया निष्पत्ति यानी शारीरिक रूप से किसी भी प्रकार का संभोग नहीं कर सकते।विशेष नियम है कि संत किसी स्त्री को छू नहीं सकते,यहां तक कि अपनी मां या बहन को भी।सभा में स्त्री व पुरुष के बैठने की अलग व्यवस्था होती है। संप्रदाय के इन नियमों का मकसद लैंगिक भेद नहीं था। भगवान स्वामी नारायण के ग्रंथ शिक्षापत्री व वचनामृत के अनुसार ब्रम्हचर्य के पालन से ऊर्जा उर्ध्वगामी होती है। बुध्दि तीव्र होती है,आत्मसाक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।भगवान की भक्ति में आसानी होती है।
फ्रांस में विवाद बढने के बाद पेरिस स्थित बीएपीएस मंदिर ने घटना के लिए माफी मांगी है और कहा है कि महिलाओं से दूरा का यह नियम महिलाओ को कमतर मानने के लिए नहीं है।यह तो आध्यात्मिक अनुशासन के लिए है।बीएपीएस के दुनिया भर में १३०० से अधिक मंदिर हैं और १० लाख से ज्यादा अनुयायी हैं तो उनको भविष्य मे इस तरह के विवाद से बचने के लिए भी नियम बनाने होंगे जैसे मंदिर के मंदिर जाने की जगह अगर वह ऐसी जगह न जाएं जहां महिलाएं हो या फिर अपने पुराने नियमों को बदल कर संतों को भीतर से इतने मजबूत बनाएं कि महिलाओं के बीच वह सहज,सरल रह सकें। महिला को महिला होने नाते सम्मान कर सकें।पेरिस में हुई घटना के बाद से संस्था को तो पिछड़ी सोच का माना ही जाएगा,हिंदू धर्म विरोधियों को भी हिंदू धर्म का मजाक करने का मौका मिलेगा।
इससे कुछ लोगों को कहने का मौका मिल गया है, हिंदुओ का मजाक उड़ाने का मौका मिल गया है,एक आलोचक का कहना है कि आप महिलाओं से संपर्क कम करना चाहते हैं तो फिर एफिल टॉवर जाना क्यों चाहते हैं.एक आलोचक को यह कहने का मौका मिल गया कि हिंदू कहते हैं कि हिंदू धर्म मुक्ति,समानता,खुलेपन की बात करता है,वह सबसे प्रगतिशील धर्म है,केवल इसकी प्रथाएं पिछड़ी हुई हैं।कुछ लोग कह सकते हैं कि ब्रम्हचारी विवेकानंद जैसा होना चाहिए।उन्हें कोई कैसे ब्रम्हचारी मान सकता है, जिनका ब्रम्हचर्य मोम की तरह है और स्त्री के पास आने से पिघल जाए।देश ही नहीं विदेश में भी हिंदू धर्म को नीचा दिखाने वाले मौके की ताक में रहते हैं, इसलिए देश के बाहर जाने वालों को हमेशा सजग रहने की जरूरत है ताकि उनको विरोध करने या मजाक उड़ाने का कोई मौका न मिले।



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