न्याय न्याय होता है,पूरा या अधूरा नही होता है.....

Posted On:- 2026-09-06




सुनील दास

दो पक्ष न्याय के लिए अदालत जाते हैं। दोनों को उम्मीद रहती है कि उनके साथ अदालत न्याय करेगी। दोनों पक्ष को यह उम्मीद रहती है तब ही तो दोनों जाते हैं।अदालत के सामने जो बयान होते है, जो सबूत रखे जाते है।अदालत का काम उन सबूतों के आधार पर न्याय करना होता है।अदालत गवाहों के बयान व जांच एजेंसी के पेश किए सबूतों के आधार पर फैसला करती है, न्याय करती है। स्वाभाविक है कि दोनों पक्षों में किसी एक पक्ष में फैसला होता है,एक पक्ष के साथ न्याय होता है।एक पक्ष को लगता है कि उसके साथ न्याय हुआ है और एक पक्ष को लगता है कि उसके साथ न्याय नही हुआ।कुछ लोग कहते हैं कि यह अधूरा न्याय है लेकिन सच तो यह है कि कोई भी न्याय सिर्फ न्याय होता है, वह अधूरा या पूरा नहीं होता है। अदालत अगर अधूरा न्याय करती होती तो लोग अदालत के पास न्याय के लिए क्यों जाते। अदालत तय प्रक्रिया के हिसाब से न्याय करती है, इसलिए लोग न्याय की प्रक्रिया पर भरोसा करते न्याय के लिए अदालत जातें हैं।झीरम कांड में अदालत ने न्याय किया है,यह सिर्फ न्याय है इसे न्याय ही समझा जाना चाहिए।
२५ मई २०१३ को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं सहित २९ लोग मारे गए थे।घटना के बाद एनआईए ने मामले की जांच शुरू की।एनआईए इस मामले में कुछ लोगों को गिरफ्तार कर पाई।इऩके खिलाफ एनआईए कोर्ट में सितंबर २०१४ से मुकदना चल रहा था।एऩआईए ने २८ सितंबर २०२० को सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश की।जिसमें गिरफ्तार नक्सलियों के बयानों के आधार पर ३० और नक्सलियों को भी आरोपी बनाया गया।१३ साल,२८४ सुनवाई और १०१ गवाहों को सुनने के बाद अदालत ने पांच सितंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए १० लोगों को दोषी ठहराया है। मामले में नामजद कई आरोपी फरार है।अदालत को इस मामले मे सबूतों के आधार पर न्याय करना था। उसने कर दिया है।अदालत ने अपना काम कर दिया है। अब सवाल उठाने वाले सवाल उठाते रहें। कोई कहे हम संतुष्ट नहीं है, कोई कहे कि यह पूरा न्याय नही है। कोई कहे कि असली गुनहगारों को बचा लिया गया है। कोई कहे कि असली गुनहगारों को तो सजा नहीं मिली है।कहने से कुछ नहीं होता है,कहने वालों को सामने १३ साल का समय था वह जो कह रहे हैं,उसके सबूत एजेंसी को देने थे,१३ साल तक जांच में सबूत किसी ने मुहैया नहीं कराया और न्याय नही हुआ कह रहे हैं तो उनके सामने फिर मौका आएगा जब मामला ऊंची अदालत में जाएगा। वह ऊंची अदालत में सबूत पेश कर सकते है और दोषी लोगों को सजा दिला सकते हैं।
कई बार कानूनी तौर पर किसी मामले का फैसला निचली अदालत में हो जाता है तो लेकिन राजनीतिक रूप से मामला कभी समाप्त नहीं होता है क्योंकि दोनों पक्ष मामले में राजनीति करना चाहते हैं।वह नहीं चाहते हैं कि जो मामला अदालत में खत्म हो गया है,वह हमेशा के लिए खत्म हो जाए।अगर वह मामले को खत्म मान लेंगे तो राजनीति कैसे करेंगे, एक दूसरे को घटना के लिए दोषी कैसे बताएंगे। १३ साल से झीरम कांड एक दूसरे पर आरोप लगाने का मुद्दा रहा है।एक दूसरे पर झीरम कांड के लिए दोष मढ़ते रहे हैं।अदालत के फैसले के बाद भी कांग्रेस व भाजपा नेताओं के आए बयान से साफ है कि यह मुद्दा दोनों के बीच आरोप लगाने का मुद्दा बना रहेगा। २९ लोगों की हत्या के लिए वह एक दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगे। एक दूसरे से सवाल पूछते रहेंगे।यह सिलसिला अगर १३ साल से चल रहा है तो अदालत का फैसला आने के १३ साल बाद चलता रहेगा। झीरम कांड राज्य में राजनीति का स्थायी मुद्दा रहा है और स्थायी मुद्दा अगले १३ साल तक बना रहेगा।
यह तो सच है कि नक्सलियों ने झीरम घाटी में हत्या की है।सब जानते हैं कि नक्सली किसी नेता या किसी ग्रामीण क्यों करते रहे हैं।उनका हत्या का मकसद तो हमेशा से ही क्षेत्र विशेष में आतंक फैलाना रहा है। हर हत्या का उनका एक ही मकसद था कि लोगों में भय पैदा करना ताकि उनके क्षेत्र में लोग डर कर न आएं, जो रहते हैं वह डरकर रहें। नक्सलियों ने कई दशकों में बड़ी संख्या में लोगो की हत्या आंतक फैलाने के लिए की है।उनकी हत्या का मकसद कभी राजनीतिक नहीं रहा है।वह किसी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने के लिए हत्या करते हीं नहीं थे, वह तो राजनीतिक नेताओं की हत्या भी आंतक फैलाने के लिए करते थे कि वह तो आम लोगों सहित शासन को संदेश देते थे हत्या करके कि हमारे इलाके में हम किसी को भी मार सकते हैं।यहां हमारा राज है,हम जो चाहेंगे वही होगा।इसलिए कांग्रेस नेताओं का एक मकसद भी आतंक फैलाना रहा हो।
हर मामले में दो पक्ष होते हैं। एक पक्ष न्याय से संतुष्ट है तो दूसरा पक्ष न्याय से असंतुष्ट हो सकता है।हमारे यहां व्यवस्था है कि अगर किसी को लगता कि एक अदालत ने उसके साथ न्याय नहीं किया है तो उसके लिए न्याय के लिए ऊपर की अदालत है, वह ऊपर की अदालत में न्याय के लिए जा सकते हैं।झीरम मामले में हाईकोर्ट जाने वाले को यह समझ लेना चाहिए कि वहां भी कोई फैसला होगा तो सबूत के आधार पर होगा। वहां भी न्याय मांगने वालों को सबूत तो देना ही होगा। बाहर राजनीति के लिए तो कोई आरोप किसी पर लगाया जा सकता है लेकिन अदालत में कोई फैसला किसी के आरोप से तो होता नहीं है। अदालत पेश किए गए सबूत के आधार पर फैसला करती है चाहे वह निचली अदालत हो या ऊपरी अदालत। निचली अदालत हो या ऊपरी अदालत जैसा सबूत पेश किया जाएगा वैसा फैसला किया जाएगा।



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