रायपुर (वीएनएस)। विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में मंगलवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने लोभ ध्यान से बचने के लिए मन पर नियंत्रण रखने का संदेश दिया। धर्मसभा में प्रतिदिन आचार्य वीरभद्राचार्य रचित आतुर प्रत्याख्यान ग्रंथ के माध्यम से मुनिश्री श्रावक-श्राविकाओं को आत्मकल्याण का मार्ग समझा रहे हैं।
मुनिश्री ने कहा कि लोभ ध्यान सर्वव्यापी है। छोटे से छोटे जीव से लेकर बड़े से बड़े जीव तक इससे प्रभावित होते हैं। सब कुछ उपलब्ध होने के बाद भी अधिक पाने की इच्छा, लालसा और अभिलाषा ही लोभ है। जब तक मन में लोभ बना रहता है, तब तक आत्मा विचलित रहती है।
उन्होंने कहा कि संसार के पदार्थों के प्रति आकर्षण और उन्हें पाने की इच्छा लोभ को बढ़ाती है। पहले वस्तुओं को प्राप्त करने की लालसा होती है, फिर उन्हें संग्रहित करने और संग्रह के बाद सुरक्षित रखने की चिंता बनी रहती है। इस तरह लोभ की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जाती है।
मुनिश्री ने कहा कि मन को नियंत्रित करना जरूरी है। मन जितना भटकेगा, लोभ उतना ही बढ़ेगा। मन पर विजय प्राप्त करने से ही लोभ की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है। लोभ की पूर्ति नहीं होने पर द्वेष की भावना जन्म लेती है। द्वेष बढ़ने से व्यक्ति की आस्था और धर्म से जुड़ाव प्रभावित होता है तथा वह देव, गुरु और धर्म से दूर हो सकता है।
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