बेमेतरा (वीएनएस)। छत्तीसगढ़ शासन की मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेस योजना बेमेतरा जिले में किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है। कृषि विभाग के मार्गदर्शन, उन्नत बीजों की उपलब्धता तथा वैज्ञानिक खेती तकनीकों के कारण जिले में ग्रीष्मकालीन उड़द एवं मूंग की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है। इसका सकारात्मक परिणाम किसानों की आय, उत्पादन क्षमता तथा मृदा स्वास्थ्य में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। पिछले वर्ष जहां जिले में केवल 285 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन उड़द-मूंग की खेती की गई थी, वहीं वर्ष 2026 में यह क्षेत्र बढ़कर 1191 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। इसके अंतर्गत लगभग 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में 1280 किसानों द्वारा उड़द फसल के प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं। इन प्रदर्शनों के माध्यम से किसानों ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर बेहतर उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए हैं।
हरदी के किसान इंद्रकुमार बने अन्य किसानों के लिए प्रेरणा :
विकासखंड नवागढ़ के ग्राम हरदी निवासी कृषक इंद्रकुमार ने मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेस के अंतर्गत ग्रीष्मकालीन उड़द का प्रदर्शन लगाया। उन्होंने 25 अप्रैल 2026 को छिड़कवा पद्धति से उड़द की बुवाई की। वर्तमान में उनकी फसल उत्कृष्ट स्थिति में है तथा कृषि विभाग द्वारा किए गए आकलन के अनुसार उन्हें 7 से 8 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन प्राप्त होने की संभावना है। इंद्रकुमार बताते हैं कि कृषि विभाग से प्राप्त तकनीकी मार्गदर्शन और उन्नत बीजों के उपयोग से फसल की बढ़वार अत्यंत अच्छी रही। ग्रीष्मकालीन मौसम में भी उड़द की सफल खेती संभव है, यह उन्होंने अपने खेत में साबित कर दिखाया है। उनके खेत का प्रदर्शन आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गया है।
कोरकापारा के शिवशंकर वर्मा ने अपनाई उन्नत खेती तकनीक :
इसी प्रकार विकासखंड नवागढ़ के ग्राम कोरकापारा निवासी कृषक शिवशंकर वर्मा ने भी योजना के अंतर्गत उड़द फसल का प्रदर्शन किया। उन्होंने 09 अप्रैल 2026 को छिड़कवा पद्धति से बुवाई की। वर्तमान में उनकी फसल अच्छी अवस्था में है तथा 5 से 6 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन मिलने की संभावना है। वर्मा का कहना है कि पहले वे ग्रीष्मकालीन दलहन फसलों के प्रति आश्वस्त नहीं थे, लेकिन कृषि विभाग के निरंतर मार्गदर्शन और प्रदर्शन कार्यक्रम से प्रेरित होकर उन्होंने उड़द की खेती शुरू की। अब उन्हें बेहतर उत्पादन और अतिरिक्त आय की उम्मीद है।
आय वृद्धि के साथ मृदा स्वास्थ्य को भी लाभ :
ग्रीष्मकालीन उड़द एवं मूंग जैसी दलहन फसलें केवल किसानों की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भूमि की उर्वरता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। दलहन फसलें वातावरणीय नाइट्रोजन को स्थिर कर मिट्टी में उपलब्ध कराती हैं, जिससे आगामी फसलों को पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। इसके अलावा आवश्यकता पड़ने पर इन फसलों का उपयोग हरी खाद के रूप में भी किया जा सकता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता और बेहतर होती है।
कृषि आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता बेमेतरा :
बेमेतरा जिले में ग्रीष्मकालीन उड़द-मूंग की खेती का बढ़ता रकबा और किसानों की बढ़ती भागीदारी यह सिद्ध करती है कि वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, उन्नत बीजों तथा कृषि विभाग के सतत मार्गदर्शन से खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। हरदी के इंद्रकुमार और कोरकापारा के शिवशंकर वर्मा जैसे किसान आज जिले में आत्मनिर्भर कृषि के प्रतीक बनकर उभर रहे हैं।
मिशन फॉर आत्मनिर्भरता इन पल्सेस के माध्यम से बेमेतरा जिले में ग्रीष्मकालीन दलहन उत्पादन को नई गति मिली है। किसानों की बढ़ती सहभागिता, बेहतर उत्पादन की संभावनाएं और मृदा स्वास्थ्य में सुधार इस योजना की सफलता को दर्शाते हैं। इंद्रकुमार एवं शिवशंकर वर्मा की सफलता यह संदेश देती है कि आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं तथा आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा सकते हैं।
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