सभ्य समाज,सभ्य लोगों की अपनी एक भाषा होती है जिसमें वह अपने विचार व भाव को प्रकट करता है। अपने दुख,सुख,संवेदना को एक दूसरे के सामने प्रकट करता है।भाषा के जरिए हम एक दूसरे से जुड़ते हैं, एक दूसरे को आपस जोड़ते हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो भाषा सकारात्मक होती है।हमारी भाषा से लोगों को पता चलता है कि हम क्या है, कैसे है,सभ्य हैं, शालीन हैं। एक तरह से हमारी भाषा हमारे बारे में दूसरों को बताती है,दूसरे हमको हमारी भाषा के जरिए भी जानते हैं कि हम कितने सभ्य है, हम कितने शालीन हैं। हम एक दूसरे का कितना सम्मान करते हैं,एक दूसरे का कितना आदर करते हैं।हमारी भाषा से हमारी स्थिति का भी पता चलता है,हम दुख में होते हैं तो हमारी भाषा अलग होती है, हम सुख में होते हैं तो हमारी भाषा अलग होती है।लेकिन जब हम गुस्से में होते हैं तो हमारी भाषा में गालियां होती है और जब हम बहुत गुस्से में होते हैं तो हमारी भाषा खो जाती है,हमारी भाषा खत्म हो जाती है, हम बहुत सारी गालियां देते हैं। इसलिए कहा जाता है कि जहां हमारी भाषा खत्म हो जाती है,वहां से गाली शुरू होती है।जब गाली खत्म हो जाती है तो आपस में मारपीट शुरू हो जाती है। हमारे देश में आजादी के बाद से आंदोलन होते रहे हैं, नारेबाजी होती रही है,आंदोलन में गाली कभी नही दी गई.आंदोलन में गाली का उपयोग कभी नहीं किया गया इसीलिए जब सीजेपी के आंदोलन में गालियों वाले भद्दे पोस्टर,युवाओं ने भद्दी गाली दी,खूब हिंसा हुई,तोड़फोड़ हुई तो लोगों को बुरा लगा है,लोगों ने कहा है यह कैसा आंदोलन है।
हम लोगों ने पढ़ा है कि देश में सबसे बड़ा आंदोलन देश की आजादी के लिए किया गया आंदोलन था।तब देश की आजादी के लिए लोगों को प्रेरित करने वाले नारे लगाए जाते थे।तुम मुझे खून दो,मैं तु्म्हें आजादी दूंगा, स्वराज्य मेरा जन्मसिध्द अधिकार है।आजादी के बाद होने वाले आंदोलनों में भी खूब नारे लगते रहे हैं।इंकलाब जिंदाबाद,तानाशाही नहीं चलेगी,अपना हक हम लेकर रहेंगे,हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। आंदोलन चाहे किसी संस्था के खिलाफ है,किसी राज्य सरकार के खिलाफ है या केंद्र सरकार के खिलाफ है, आंदोलन में किसी को गाली नहीं दी जाती थी।पिछले एक दशक में हुए आंदोलन में किसी नेता का बुरा जरूर चाहा गया है, कहा गया मर जा मोदी, कहा गया है कि मोदी तेरी कब्र खुदेगी आज नहीं तो कल खुदेगी। मौत का सौदागर,दस सिर वाला रावण आदि कहा गया।बिहार चुनाव के समय तो पीएम मोदी काे मां की गाली दी गई। इससे राजनीति में भाषा का स्तर गिरा और गिरता चला गया है। सीजेपी के आंदोलन से तो साफ हो गया है कि आने वाली पीढ़ी की भाषा कितनी खराब हो गई है।उसके पास अपने गुस्से को प्रकट के लिए अच्छे शब्द नही है, उसके पास गुस्से का प्रकट करने के लिए गंदी भाषा, गंदे मीम हैं, गंदे पोस्टर हैं। वह पुरानी पीढ़ी को निश्चित तौर पर बुरे लगेंगे कि क्योंकि पुरानी पीढ़ी की भाषा में मर्यादा का ख्याल रखा जाता था, अपने विचार व गुस्से को अच्छे शब्दों में प्रकट करने की काबिलियत थी।
यही वजह है कि सीजेपी के आंदोलन में शामिल होने वाले जेन जी की भाषा को लेकर लोग अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं तो कई लोग उनका पक्ष ले रहे हैं।कंगना रनौत का तो कहना है कि जंतर-मंतर में हुए विरोध प्रदर्शन से जुडे़ सोशल मीडिया में वायरल वीडियो को गंदगी,कचरे और भद्देपन का प्रदर्शन है।उनका कहना है कि मैंने अपनी जिंदगी में कभी किसी एक जगह इतना भद्दापन नहीं देखा। कुछ लोग कहते हैं कि जेनजी की भाषा शालीन नहीं है,वह बहुत गालियां देते हैं।पुरानी पीढ़ी के लिए गाली देना बहुत बुरी बात थी, इसलिए उनको नई पीढ़ी की गालीवाली भाषा बुरी लगती है।कुछ लोग कहते हैं कि जेन जी पेपर लीक के खिलाफ अपने गुस्से को अपने समय और समाज के असंतोष को गाली देकर व्यक्त कर रहे हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि गाली तो हमारे समाज में हमेशा से रही हैं, उसका आविष्कार जेनजी ने नहीं किया है क्योंकि गाली एक विचार नहीं है, अपने भाव की अभिव्यक्ति है।कुछ लोग कहते हैं कि गाली का जवाब कई बार गाली होता है, छोटी गाली का जवाब बड़ी गाली होती है।तब गाली प्रतिरोध का रूप होती है,तब गाली विरोध का रूप होती है, तब गाली बगावत का रूप होती है।जब व्यापक दमन,उत्पीड़न होता है तो वह गाली के विस्फोट के रूप में आता है।कुछ लोग कहते हैं कि जेनजी ने सड़क पर उतर कर सत्ता को चुनौती दी है और जब देश का विपक्ष अपना काम नहीं कर पा रहा था को यह काम जेनजी काे जंतर मंतर में उतरकर,सड़क पर उतरकर करना पडा।देश में कमजोर विपक्ष,बिखरा हुआ विपक्ष युवाओं के लिए कुछ नहीं कर पा रहा था, बहुत दिन तक युवाओं ने देखा और जाना कि यह विपक्ष हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता तो वह खुद सीजेपी आंदोलन के जरिए जंतर मंतर व सड़क पर आया। वह जैसा भी है, उसे अब स्वीकारना होगा क्योंकि क्रिया की प्रतिक्रिया तो होती है।जेनजी का आंदोलन कमजोर विपक्ष की विफलता का परिणाम है।विपक्ष इसी तरह कमजोर बना रहा तो आने वाले समय में देश में इसी तरह के और आंदोलन देखने को मिलेंगे।
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