जरूरत थी कड़े कानून की और वह बन गया है

Posted On:- 2026-08-01




सुनील दास

देश में पिछले एक दो दशक से राज्य स्तर पर होने वाली प्रतियोगी,प्रवेश परीक्षा या किसी पद विशेष के लिए होने वाली परीक्षा हो उसके पेपर लीक होना एक बड़ी समस्या के रूप मे सामने आया है और इस समस्या के समाधान के लिए और कड़े कानून की मांग भी देश में युवाओं की तरफ से की जा रही थी।युवाओं का मानना था कि देश में पेपर लीक रोकने के लिए कानून तो हैं लेकिन कड़ा कानून नहीं है, इससे पेपर लीकर करने वालों को पेपर लीक करते हुए कोई डर नहीं होता है और यह डर न होने के कारण आए दिन किसी भी राज्य या केंद्र स्तर की कोई प्रतियोगी परीक्षा,प्रवेश परीक्षा हो तो उसका पेपर लीक कहीं न कहीं कर दिया जाता है।हाल में नीट परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद परीक्षा फिर से आयोजित की गई इसके बाद पेपर लीक को लेकर पिछले एक दो महीने से देश के युवा में गहरी नाराजगी थी और वह चाहते थे कि इसे रोकने के लिए सरकार कड़ा कानून बनाए और जो भी तकनीकी सुधार हो सकते हैं, वह सुधार भी जल्द किया जाए।मोदी सरकार ने कड़ा कानून बना दिया है,राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद वह पूरे देश में लागू हो गया है और तकनीकी सुधार के लिए एक तकनीकी विशेषज्ञों की समिति बनाकर एक कदम भी उठाया है। पेपर लीक रोकने केलिए सरकार की तरफ से जो कुछ जल्द से जल्द हो सकता था, वह तो कर दिया गया है।लेकिन विपक्ष व सीजेपी से युवाओं को जो उम्मीदें थी, वह पूरी नहीं हुई है क्योंकि उनका लक्ष्य बेहतर परीक्षा व्यवस्था बनवाना था ही नहीं।
जब भी किसी देश प्रदेश में किसी मुद्दे को लेकर युवाओं में नाराजगी पैदा होती है तो उसका लाभ उठाने वाले भी सामने आ जाते हैं तो  पेपर लीक को लेकर युवाओं में हुए पैदा हुए असंतोष व गु्स्से को देखते हुए अभिजीत दीपके ने काकरोच जनता पार्टी बनाकर मौके का फायदा उठाया।वह युवाओं के संगठन व नेता के रूप में सामने आया। सीजेपी के झंडे तले अनशन व आंदोलन किया। लेकिन उसका लक्ष्य न तो कड़ा कानून बनवाना था और न ही तकनीकी सुधार कैसे हो सकता है, बताना था।सीजेपी युवाओं का आंदोलन था लेकिन वह शिक्षामंत्री के इस्तीफे तक ही सीमित रह गया। एक महीने के आंदोलन के बाद शिक्षामंत्री ने इस्तीफा दिया और सीजेपी वाल खुश हो गए कि उनका आंदोलन सफल रहा। इससे युवा ठगे रहे गए क्योंकि वह जानते समझते हैं कि शिक्षामंत्री के इस्तीफे से पेपर लीक होना थोड़ी न बंद हो सकता है। उनकी जो भी समस्याएं हैं वह हल थोड़ी न होती हैं।युवा जो चाहते थे संसद के बाहर वह न तो सीजेपी ने किया और संसद के भीतर न तो कांग्रेस व विपक्ष ने किया।
संसद के भीतर पेपर लीक रोकने लाए गए संशोधन विधेयक पर कांग्रेस सहित विपक्ष के तमाम नेता और बेहतर सुझाव दे सकते थे. यह विपक्ष का सकारात्मक कदम होता है, युवाओं को भी लगता कि सरकार के साथ ही विपक्ष भी पेपर लीक रोकने के लिए कुछ करना चाहता है।सरकार के साथ ही कांग्रेस व विपक्ष भी युवाओं की समस्या हल करना चाहता है।विपक्ष की सकारात्मक छवि के लिए विपक्ष को यह करना था लेकिन विपक्ष ने राहुल गांधी के नेतृत्व में फिर साबित किया की कि विपक्ष का काम संसद के भीतर सरकार के हर अच्छे कदम का विरोध करना है,संसद में हंगामा करना है, संसद नहीं चलने देना है।जिस विषय में बहस हो रही हो, उस विषय में कुछ अच्छा कहने की जगह विवाद को बढ़ावा देने वाली बाते कहना है।विपक्ष के नेताओं ने कहा कि सुधार से कुछ नहीं होगा,सजा बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा।कानून तो पहले से बने हैं लेकिन उससे परीक्षा पेपर लीक होना बंद हुआ क्या। वहीं सरकार की तरफ से कहा गया कि युवाओं की मांग सख्त कानून बनाने की सरकार ने सख्त कानून बना दिया है,इससे अब पेपरलीक करने वालों में डर पैदा होगा कि वह पकड़े गए तो उनके सख्त सजा मिलेगी, करोड़ों रुपए जुर्माना देना पड़ेगा,समयबध्द सुनवाई से जल्द फैसला होगा। 
नीट पेपर लीक रोकने का सख्त कानून संसद से पास होने के बाद मंजूरी के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पास भेजा गया था और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद वह पूरे देश में शुक्रवार रात से लागू हो गया है।खास बात यह रही कि यह सख्त कानून महज तीन दिन में दोनों सदनों से पारित होकर राष्टपति की मंजूरी के बाद देश में लागू हो गया यानी जितनी जल्दी हो सकता था सरकार ने युवाओं के हित में एक कड़ा बनाकर पारित कराकर लागू करवा दिया है।इससे पता चलता है कि सरकार युवाओं की मांग को पूरा करने, उनकी समस्या काे हल करने के लिए कितनी संवेदनशील है।नया कानून लागू होने के बाद कोई पेपर लीक करता है तो व्यक्तिगत तौर पर पांच साल की सजा होगी और पचास लाख रुपए जुर्माना होगा।वहीं एजेसी व संगठित रूप से यह अपराध करने पर १० साल की सजा व दस करोड़ रुपए का जुर्माना होगा। सबसे अच्छी बात यह है कि पेपर लीक मामले में जांच व मुकदमे की समयसीमा पांच माह तय की गई है यानी पेपर लीक करने वाले को पांच माह में सजा मिलेगी।यह सच है कि कानून बनने से अपराध रूकते नहीं है लेकिन यह भी सच है कि अपराध के लिए जब कड़े कानून बनते हैं तो उसका असर अपराध करने वालों पर पड़ता है,उनमें डर पैदा होता है कि अब ज्यादा सजा होगी,जल्द सजा होगी और जुर्माना ज्यादा देना होगा। यही वजह है कि वक्त बदलने के साथ ही कड़े कानून की मांग देश के लोग व युवा करते हैं और कड़े से कड़े कानून बनाए जाते हैं।



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