तुष्टिकरण के लिए राष्ट्रीय गीत पूरा नहीं गाएगी कांग्रेस

Posted On:- 2026-08-20




सुनील दास

राजनीति तब सफल मानी जाती है जब कोई राजनीतिक दल एक के बाद कई चुनाव जीतता है और राजनीति तब असफल मानी जाती है जब कोई राजनीतिक एक के बाद एक कई चुनाव हारता जाता है और उसके निकट भविष्य में कोई चुनाव जीतने की उम्मीद नहीं बची रहती है। जीतने वाले दल को मालूम रहता है कि उसे चुनाव जीतने के लिए क्या करना है।उसके पास पांच साल समय रहता है जीतने के लिए बहुत कुछ करने को और वह करता भी है इसलिए सत्तारूढ़ दल के जीतने की उम्मीद ज्यादा रहती है और कोई काम न करने के कारण विपक्ष के जीतने की उम्मीद कम रहती है।ऐसे में विपक्ष चुनाव जीतने के लिए कुछ न कुछ ऐसा करता है जिससे उसको उम्मीद रहती है कि मैं ऐसा करूंगा तो जीतने की उम्मीद रहेगी।कांग्रेस ऐसी राजनीतिक पार्टी है जो अपने नेता राहुल गांधी के कारण चुनाव हार जाती है,लेकिन वह उन्हें बदल नहीं सकती इसलिए वह नए नए उपाय सोचती है कि ऐसा करने पर कांग्रेस चुनाव जीत सकती है।राष्ट्रीय गीत पूरा नहीं गाने का फैसला इसी तरह का उपाय माना जा रहा है।
राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को पूरा गाने को लेकर कांग्रेस का वर्तमान का विरोध तब विवाद का विषय बना जब कांग्रेस मुख्यालय में इसके गायन के दौरान ऐसा कुछ हुआ जिसको लेकर कहा गया कि कांग्रेस मुख्यालय में राष्ट्रीय गीत का अपमान किया गया है। इस पर कांग्रेस की तरफ सफाई दी गई लेकिन विवाद थमा नहीं जब गोवा व केरल में भी पूरा राष्ट्रीय गीत नहीं गाया गया और कांग्रेस अध्यक्ष एम खरगे ने कहा कि गोवा मे उन्होंने वही गाया जो राष्ट्रवादी नेताओंं महात्मा गांधी,सरदार वल्लभभाई पटेल,अटल बिहारी वाजपेयी ने गाया था।इस मौके पर खरगे ने यह तर्क भी दिया कि यदि उन्होंने जितना वंदे मातरम गाया है वह अपराध है तो उन  नेताओं के खिलाफ भी मामले दर्ज किए जाने चाहिए जिन्होंने इसे उसी तरह गाया। मैंने वही किया जो पिछले ८० वर्षों से हो रहा है।कांग्रेस अध्यक्ष देश के बड़े नेताओं की आड़ लेकर अपनी गलती को सही बताना चाह रहे हैं लेकिन राष्टीय गीत के सम्मान का कानून बन जाने के बाद माना तो यह जाएगा कि कांग्रेस अध्यक्ष ने कानून की जानकारी होते हुए भी कानून का पालन नहीं किया और राष्ट्रीय गीत का अपमान किया है।
इससे साफ हो जाता है कि कांग्रेस राष्ट्रीय गीत को लेकर राजनीति करना चाहती है।राष्ट्रीय गीत के मात्र दो पद गाना इस देश की परंपरा रही है कांग्रेस इस परंपरा को सही बताना चाहती है यानी राष्ट्रीय गीत का सम्मान वह जितना करती आई है उतना ही करेगी। भाजपा ने वंदे मातरण के १५० वर्ष पूरे होने पर देश भर में ७ नवंबर २०२५ से ७ नवंबर २०२६ तक समारोह आयोजित करने का फैसला किया और साथ ही इसे पूरा गाने के लिए और इसका अपमान रोकने के लिए अगस्त २०२६ को कानून भी बनाया है। इस कानून के तहत राष्ट्रीय गीत का अपमान करने व इसके गायन में बाधा डालना दंडनीय अपराध हो गया है। ऐसा करके भाजपा ने अपने आपको राष्ट्रवादी पार्टी साबित किया और यही कांग्रेस को पसंद नहीं आ रहा है कि भाजपा उससे ज्यादा राष्ट्रवादी पार्टी कैसे हो सकती है इसलिए वह अपनी परंपरा की बात कर, पुराने नेताओं की बात कर खुद का सही साबित करने का प्रयास कर रही है और खुद को भाजपा से ज्यादा राष्ट्रवादी साबित करने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस बता रही है कि २८ अक्टूबर १९३७ को कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में तय हुआ था कि वंदे मातरम के शुरू के दो छंद गाए जाएंगे,तब से यही गाया जा रहा है।वह यह नहीं बता रही है कि १८९६ से लेकर १९३६ तक कांग्रेस के सभी अधिवेशनों में वंदे मातरम के पूरे छंद गाए जाते थे। कट्टर सांप्रदायिक और भारत विभाजन की मांग करने वाले मुस्लिम लीग दवाब में वंदेमातरम के दो पद गाने का फैसला किया गया।यह शुध्द रूप से मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए किया गया और आड़ ली गई गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगाेर की कि उनके सुझाव पर ऐसा किया गया। यह नहीं बताया जाता है कि गुरुदेव ने यह सुझाव तब दिया था जब पं.नेहरू सहित अनेक कांग्रेस नेताओं ने कहा था कि जिन पंक्तियों पर मुस्लिमों का आपत्ति है,हमे हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए उस पर जोर नहीं देना चाहिए।सच तो यह माना जाता है कि गुरुदेव को हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर राजी किया गया था।
आजादी के समय कांग्रेस की जो मानसिकता थी, वह कभी बदली नहीं इसलिए आजादी के बाद भी वह ऱाष्ट्रवादी पार्टी होने पर गर्व करते हुए राष्ट्रीय गीत को जो सम्मान देश में मिलना था, उसे देने के लिए सोचा नहीं। भाजपा तो वह काम खुशी खुशी करती है जो काम कांग्रेस आजादी के बाद नहीं कर सकी है,इससे भाजपा को मौका मिलता है खुद को कांग्रेस को ज्यादा राष्ट्रवादी साबित करने और भाजपा चूकती नहीं है। पीएम मोदी की राजनीति में राष्ट्रवाद भी एक ऐसा मुद्दा जिसके कारण भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा वोट मिलता है।हर चुनाव के पहले भाजपा इसे मुद्दा बनाती है, इस बार भी अगले साल होने वाले कई चुनावों में यह मुद्दा रहेगा।कांग्रेस कमजोर है मुस्लिम वोट न मिलने के कारण इसलिए वह सोचती है कि यूपी के चुनाव में उसे इसी आधार पर वोट मिल सकता है कि उसने वंदे मातरम के पूरा गायन का विरोध किया।वह मान रही है कि वंदे मातरम का अपमान करने पर उसे अपना मुस्लिम वोट बैंक वापस मिल सकता है।कांग्रेस के लिए यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि वह तो आजादी के पहले और आजादी के बाद भी ऐसा करती रही है। वह अपने फायदे की सोच रही है,देश के बारे मे नहीं सोच रही है। यही फर्क है आज भाजपा और कांग्रेस में।



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