फिर ऐसी पीड़ा न हो किसी को कौन सोचता है......

Posted On:- 2026-08-21




सुनील दास

रोज हादसे होते रहते हैं,रोज हर उमर के लोग मरते रहते हैं,कोई अपनी गलती से मरता है तो कोई दूसरों की गलती मरता है।कोई चाहे अपनी गलती से मरे या किसी दूसरे की गलती से मरे,किसी न किसी को पीड़ा तो होती है।ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं जो दूसरे  की पीड़ा को महसूस नहीं करते है और सोचते है अपनी गलती के कारण उसे ऐसी पीड़ा हुई है,कुछ लोग होते हैं कि थोड़ी देर के पीड़ा महसूस करते हैं और सांत्वना देने तक ही सीमित रहते हैं।बहुत ही कम लोग ऐसे होते हैं जो अपनी या दूसरों की पीड़ा की इतनी गहराई से महसूस करते हैं कि वह सोचते है कि जैसी पीड़ा मुझे हुई है, वैसी पीड़ा किसी दूसरे को न हो।पीड़ा को बहुत गहराई से महसूस करने के कारण वह ऐसा कुछ करते भी हैं कि जैसी पीड़ा उनको किसी कारण से हुई है, वैसी पीड़ा दूसरों को न हो।ऐसे लोग मनुष्य समाज के लिए अऩमोल होते है. ऐसे लोग ही समाज को पीड़ा से बचाने वाले होते हैं।राजनीतिक दल के नेता व पार्षद तो इसी बात पर राजनीति करते रह जाते हैं कि किसी को पीड़ा हुई है तो उसके लिए सरकार,शहर सरकार कितनी जिम्मेदार है। वह पीड़ा को लेकर हल्ला तो बहुत करते हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं करते हैं कि फिऱ वैसी पीड़ा किसी को न हो।
बहुत सारे ऐसे छोटे छोटे काम होते हैं जो नहीं किए जाते है तो किसी एक परिवार को उससे तकलीफ होती है, किसी बस्ती के लोगों को तकलीफ होती है। ये छोटे छोटे काम तो कोई भी कर सकता है लेकिन ज्यादातर लोग सोचते हैं कि यह काम तो निगम का है या सरकार का है।इसलिए वे किए नहीं जाते हैं और हादसे के बाद हादसे होते रहते हैं,कई परिवारों को तकलीफ होती है पर कोई सबक नहीं लेता है।कहीं पर नाले को नहीं ढके जाने पर किसी के घर के बच्चे की बहकर मौत हो जाती है,किसी गहरे खदान डूबकर युवकों की मौत हो जाती है,कहीं पर आंगनबाड़ी जाते बच्चे की गड्ढे में डूबकर मौत हो जाती है।इन तमाम लोगों को मरने के बाद हो हल्ला तो बहुत होता है। कोई निगम,कोई सरकार को और कोई प्रशासन को कोसता है। कुछ दिन जमकर राजनीति होती है,राजनीति करने वाले कुछ दिन राजनीति करके चुप हो जाते है। कोई यह नहीं सोचता है कि यह छोटा सा काम है यह काम तो हम शहर व मोहल्ले के कुछ लोग मिलकर सकते हैंं।
अक्सर काम करने को कोई नहीं सोचता है क्योंकि जो घटनाएं होती है, उसकी पीड़ा को कोई गहराई से महसूस नहीं करता है। वह यह सोच ही नहीं पाता है कि हम मिलकर भी बहुत कुछ कर सकते है,हम सरकार या निगम के भरोसे क्यों रहे इस छोटे से काम के लिए।किसी मोहल्ले के घरों के पास नाला खुला हुआ है तो उस ढकने के लिए कोई लाखों रुपए नहीं लगने है, सौ पचास फर्शी पत्थर लाकर अस्थायी तौर पर नाले को ढका तो जा सकता है। सब बैठे रहे कि यह काम निगम करेगा और एक बच्चे की मौत हो गई।नकटी गांव के पास ब्लू वाटर खदान में फिर एक युवक की डूबने से मौत हो गई।वहां चेतावनी का बोर्ड लगे होने के बाद युवक नहाने पहुंच जाते हैं और उनमें कुछ अभागे लोगों की डूबने से मौत हो जाती है। सबको मालूम है कि यहां नहाने में खतरा है इसके बाद भी नहाने पहुंच जाते हैं क्योंकि इस ब्लू वाटर खदान के आसपास ऐसी व्यवस्था दस साल में नहीं की जा सकी है कि कोई गहरे खदान में नहाने के लिए जा नहीं सके।
दस साल में दस लोगों की इस खदान में डूबने से मौत हो चुकी है। किसी की मौत हो जाने के बाद कुछ दिनो तक शोरशराबा होता है।फिर सब किसी की मौत का इंतजार करते रहते हैं।नकटी गांव में पंचायत है वह भी ऐसी कोई व्यवस्था कर सकती है कि लोग उस खदान तक न जा सकें. उसका कहना है कि उसने तो कई बार प्रशासन से मांग की यहां कंटीले तार लगाए जाएं लेकिन नहीं लगाए गए।दस साल ऐसे ही गुजर गए सब मांग करते रहे कि खदान के आसपास कंटीले तार लगा दिए जाएं,जिला प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया और दस साल में दस लोगों की मौत हो गई।पंचायत को लगा कि कम से कम यहां चेतावनी बोर्ड लगा देना चाहिए तो उसने यह काम कर दिया। चेतावनी बोर्ड लगे होने के बाद भी मौत का सिलसिला नहीं रुका है।२०१७ से शुरू हुआ मौत का सिलसिला अब तक जारी है।एक मौत २०१७ में हुए,दूसरी २०१९ में हुई,४ लोगों की मौत २०२३ में हुई,२०२५ में दो लोगों की मौत हुई और अब २०२६ में एक युवक की मौत हुई है।
जिले के लोगों ने एक युवक की मौत से सबक लिए हुए होते, एक युवक की मौत की पीड़ा को किसी ने गहराई से महसूस किया होता तो कंटीले तार लगाने का काम कराया जा सकता था,कैसे भी कराया जा सकता था, इसके लिए दान मांगा जा सकता था, इसके लिए क्राउड फंडिग हो सकती थी, इसके लिए जिले की लोकसेवा का काम करने वाली संस्थाओं को सहयोग करने को कहा जा सकता था।सोशन मीडिया का उपयोग कर लोगों से पैसा मांगा जा सकता था, लोग लाखों रुपए लोगों की सेवा के लिए हर साल खर्च करते हैं,समाज के काम में खर्च करते हैं लेकिन अफसोस दस साल में ब्लू वाटर खदान असुरक्षित का असुरक्षित रहा। एक एक कर दस परिवारों ने अपनों को खोया, इस खदान के कारण दस परिवारों को पीड़ा हुई लेकिन उनकी पीड़ा जिले की पीडा नहीं बन सकी। सबकी पीड़ा न बन सकी।अब भी मौका है जिले की जनसेवा करने वाली संस्थाओं का सामने आना चाहिए और ब्लू वाटर खदान को कंटीले तारों से घेरना जरूरी है तो यह काम उनको करवाना चाहिए।



Related News
thumb

व्यवस्था सुधार नहीं सकते तो निरीक्षण किसलिए स्कूल का

हर राज्य में सरकारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था निरीक्षण करने का अधिकार सरकारी अधिकारियों को होता है।वह करते भी हैं ताकि जिन स्कूलों में शिक्षा के लिए ज...


thumb

तुष्टिकरण के लिए राष्ट्रीय गीत पूरा नहीं गाएगी कांग्रेस

राजनीति तब सफल मानी जाती है जब कोई राजनीतिक दल एक के बाद कई चुनाव जीतता है और राजनीति तब असफल मानी जाती है जब कोई राजनीतिक एक के बाद एक कई चुनाव हा...


thumb

अपराध किया है तो सजा जरूर मिलनी चाहिए

लोकतंत्र में लोगों को कई तरह के अधिकार मिले हुए हैं,लोगों को मिले हुए अधिकार का उपयोग करने का हक है,अधिकार का जब सदुपयोग होता है तो उसका सब स्वागत ...


thumb

मांगें मानकर छात्रों के आगे झुकी झारखंड सरकार

किसी भी देश में युवा व छात्र एक बड़ी ताकत होते हैं,वह जब अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरते हैं तो कोई भी सरकार हो देरसबेर उसे छात्रों की मांगों को ...


thumb

पीएम मोदी का दिमागी नक्सली का तीर ठीक निशाने पर लगा है

पीएम मोदी के लिए नेशन फर्स्ट हमेशा रहा है, वह देश को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों को बखूबी पहचानते हैं और समय समय पर देश के लोगों को उनसे सावधान रहने...