व्यवस्था सुधार नहीं सकते तो निरीक्षण किसलिए स्कूल का

Posted On:- 2026-08-23




सुनील दास

हर राज्य में सरकारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था निरीक्षण करने का अधिकार सरकारी अधिकारियों को होता है।वह करते भी हैं ताकि जिन स्कूलों में शिक्षा के लिए जरूरी व्यवस्था नहीं है वहां जरूरी व्यवस्था की जा सके और बच्चों को शिक्षा में सुविधा हो।स्कूलों में शिक्षा का न्यूनतम स्तर कायम रहे।हर राज्य में अगर कोई स्कूली शिक्षा व्यवस्था में कमी तलाशने जाएगा तो शायद ही कोई राज्य ऐसा होगा जहां के किसी न किसी स्कूल में कोई जरूरी व्यवस्था न मिले।किसी स्कूल का भवन नहीं होगा तो वह किसी किराए के भवन मे चल रहा होगा कई भवनों में दो पारी में स्कूल लग रहे होंगे, कई स्कूलों का अपना भवन होगा तो वह पुराना हो गया होगा,जर्जर हो गया होगा, मरम्मत की जरूरत हो मरम्मत तक नहीं हो पा रही होगी।बच्चों को समय पर गणवेश,किताबें नहीं मिलती हैं। कहीं एक ही शिक्षक मिलेगा।कहीं जरूरत से ज्यादा शिक्षक भी मिलेंगे।शिक्षक होंगे तो समय पर स्कूल नहीं आते होंगे,स्कूल आते होंगे तो ठीक से पढ़ाते नहीं होंगे। कोई शराब पीकर स्कूल आ जाता है और पढ़ा नहीं पाता है, कोई स्कूल आता है तो ध्यान पढ़ाने में कम बच्चों को सुधारने में ज्यादा रहता है।स्कूल में किसी न किसी विषय का टीचर नहीं होगा।
चाहे भाजपा की सरकार रहे या कांग्रेस की सरकार रहे या किसी तीसरे दल की सरकार रहे सरकारी स्कूल हमेशा सरकारी स्कूल ही बने रहते हैं,वहां की व्यवस्था नहीं बदलती है।कोई सरकार हिंदी स्कूलों की हालत को सुधार नहीं पाती है लेकिन अंग्रेजी मीडियम वाले स्कूल खोलकर मान लेती है कि उसने राज्य में शिक्षा की क्रांति कर दी है।स्कूलों में शिक्षकों की कमी रहती है और शिक्षकों की भर्ती नहीं होती है।कोई सरकार सरकारी स्कूलों में जरूरी सुविधाएं नहीं कर पाती है लेकिन स्मार्ट क्लास खोलने पर आमादा रहती है ताकि स्मार्ट क्लास को देखकर किसी को पता न चले कि गांवों के स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था का कितना बुरा हाल है। हर सरकार शिक्षा के लिए कुछ न कुछ करती रहती है लेकिन स्कूल शिक्षा व्यवस्था हो या उच्च शिक्षा व्यवस्था वहां जरुरी सुविधाएं नहीं होती हैं।आजादी के ८० साल बाद देश में सरकारी स्कूल व्यवस्था नहीं सुधरी है तो इसका बहुत कुछ श्रेय राज्य सरकारों को भी जाता है क्योंकि कोई भी सरकार हो वह सुधार नहीं पाती है।
यह बात भाजपा व कांग्रेस दोनों राजनीतिक दल जानते हैं इसलिए वह कुछ क्षेत्र ऐसे होते हैं जिनमें राजनीति नहीं करते या कम राजनीति करते हैं क्योंकि दोनों ही राज्य मे शासन कर चुके होते हैं और राज्य में वर्तमान में समस्या है तो दोनों समस्या के लिए दोषी है।कोई एक दूसरे को समस्या के लिए दोषी ठहराएगा तो दूसरा भी उसे भी दोषी ठहराएगा।लेकिन सीजेपी नई नई राजनीति में आई है इसलिए उसे नया नया जोश है,सरकारी व्यवस्था मै्ं खामी को बताने का। वह इस बात से खुश हो सकते हैं कि कहीं तबेले में स्कूल चल रहा था, उनके खुलासा करने से अब स्कूल तबेले में नहीं लग रहा है।वह सोच रहे होंगे कि उन्होंने कोई ईऩाम पाने वाला काम कर दिया तो यह उनकी गलतफहमी है क्योंकि एक नहीं सैकड़ों स्कूल अपना भवन न होने के कारण तबेले में लग रहे होगे।एक कमरे में लग रहे होंगे,एक कमरे में कई कक्षाएं लग रही होंगी।उनके स्कूल निरीक्षण से किसी राज्य में कुछ भी शिक्षा के क्षेत्र में बदलने वाला नहीं है।वह सोचते है कि उन्होंने आंदोलन करके शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया तो क्या देश की शिक्षा व्यवस्था सुधर गई। उनके आंदोलन या शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से देश मे कुछ भी नहीं बदलने वाला है।
देश या किसी राज्य की शिक्षा व्यवस्था को सुधारना उतना आसान नहीं है जितना काकरोच जनता पार्टी के नेता समझते हैं। किसी राज्य की शिक्षा व्यवस्था की खामी बताने से शिक्षा व्यवस्था कहां सुधरती है।वह क्या कर रहे हैं कि स्कूल में जा रहे है और बता रहे कि स्कूल में शिक्षा की क्या व्यवस्था नहीं है,उनको व्यवस्था पता चलने पर वह क्या कर सकते हैं,स्कूल सुधारने के लिए कुछ कर सकते हैं,नहीं कर सकते।जब किसी स्कूल की व्यवस्था वह सुधार नहीं सकते तो उनके स्कूल निरीक्षण करने का क्या मतलब रह जाता है। ऐसे में लोग तो यह कहेंगे ही कि सीजेपी वालों के स्कूल  निरीक्षण का मकसद तो राजनीति करना है,भाजपा शासित राज्यों के स्कूलों में जाकर क्यों शिक्षा की खामी बता रहे हैं।कांग्रेस व दूसर दलों के शासन वाले राज्यों में जाना चाहिए और बताना चाहिए वहां क्या खामी है तो समझ में आता कि उनका मकसद सभी राज्यों की शिक्षा व्यवस्था को देश के लोगों को बताना है, कई लोग तो यह भी कह सकते हैं कि स्कूलों की व्यवस्था को देश के लोगों को बताने से क्या होगा क्योंकि देश के लोग जहां रहते हैं वह वहां की शिक्षा व्यवस्था के बार मे बखूबी जानते हैं कि क्या ठीक है और क्या ठीक नहीं है।
जंतर मंतर के आंदोलन की सफलता का नशा सीजेपी नेताओं को चढ़ गया तो उनके सामने समस्या थी कि अब क्या किया जाए जिससे देश में उनकी वाहवाही हो और देश के लोगों को लगे कि हां यह लोग देश की हर जरूरी व्यवस्था सुधारने का काम कर सकते हैं।उन्होंने घोषणा कर दी कि वह राज्यों में जाएंगे और स्कूलों का निरीक्षण कर बताएंगे कि स्कूल मे क्या समस्या है। उनका पता नहीं था कि उनको यह काम करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वह भी सरकारी स्कूल है, वहां जाने के लिए अनुमति जरूरी होती है।स्कूल निरीक्षण करने का अधिकार उनको नहीं है,इसलिए स्थानीय लोगों को यह पसंद नहीं आया कि कोई बाहरी स्कूल में घुसे और स्थानीय लोगों ने उनकी पिटाई कर भगा दिया। अब वह रो-रो कह रहे हैं कि हमको मारा गया। उनकी कोई सुन नहीं रहा है क्योंकि सब मानते हैं कि कोई मार खाने वाला काम करेगा को जनता उसकी कुटाई तो करेगी ही। समझदार नेता तो वह होता है जो ऐसा काम करता नहीं है जिसे जनता पसंद नही् करती है।जनता की पसंद का काम कोई नेता करता है तो जनता तो उसकी वाहवाही करती है,जनता किसी काम की वाहवाही नहीं कर रही है तो नेताओं को समझ जाना चाहिए कि जनता क्या करने वाली है।



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