देश में आरक्षण सबसे ज्यादा संवेदनशील मुद्दा है।इसलिए राजनीतिक दल चुनावी फायदे के लिए इसे बढ़ाने की बात तो करते हैं लेकिन इस खत्म करने या इसमें सुधार के लिए चर्चा करने को भी कतई तैयार नहीं होते है।लोकतंत्र में माना तो जाता है कि हर विषय पर चर्चा हो सकती है,हर क्षेत्र में सुधार बदलते वक्त के साथ किया जा सकता है।लेकिन राजनीतिक दल चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में हो,वह चुनाव में होने वाले राजनीतिक नुकसान के चलते आरक्षण में सुधार तो दूर की बात है,वह तो इसमें सुधार के लिए भी चर्चा तक नहीं करना चाहता है।माना जाता है जो भी आरक्षण में समीक्षा,सुधार या चर्चा की बात भी करता है तो दूसरे पक्ष को यह कहने का मौका मिल जाता है,यह तो दलिताें,पिछड़ों का आरक्षण खत्म करना चाहता है।यही वजह है कि राजनीतिक इस पर चर्चा के लिए भी तैयार भी नहीं होते हैं।
देश की राजधानी दिल्ली में नीट पेपर लीक के विरोध मे युवाओं के एक महीने लंबे आंदोलन के सफल होने का परिणाम यह हुआ है कि अब जंतर मंतर में अपनी मांगों को लेकर कई संगठनों ने आंदोलन शुरू कर दिया है।स्वाभाविक है कि एक आंदोलन सफल होता है तो दूसरे संगठनों को भी लगता है कि हम आंदोलन करेंगे तो हमारा आंदोलन भी सफल हो सकता है। हमारे आंदोलन से भी देश का हर वर्ग जुड़ सकता है और सरकार को हमारी मांगों पर विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।सीजेपी के आंदोलन के बाद जंतर मंतर में देश के युवाओं का आरक्षण हटाओ या आरक्षण में सुधार की मांग को लेकर जो आंदोलन हो रहा है।उससे सत्तारूढ़ भाजपा की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है कि विपक्ष इस मुद्दे को उसके खिलाफ उपयोग कर सकता है। सरकार भले ही आरक्षण को लेकर कुछ न करने वाली हो लेकिन विपक्ष सरकार के खिलाफ यह अफवाह तो फैला ही सकता है कि सरकार सवर्ण युवाओं के दबाव में आकर आरक्षण सुधार करने वाला है। इससे दलितों व पिछड़ों का आरक्षण कम हो सकता है और उनको नुकसान हो सकता है।
विपक्ष लोकसभा चुनाव २०२४ के पहले संंविधान खत्म करने और आरक्षण समाप्त करने की अफवाह फैलाकर राजनीतिक रूप से यूपी में फायदे में रहा था और भाजपा को इसका नुकसान हुआ था और भाजपा को केंद्र में बहुमत नहीं मिल सका था। उसे दूसरे दलों के सहयोग से सरकान बनानी पड़ी थी।कांग्रेस व विपक्ष के मुंह झूठ का खून लग गया है और इससे उनको यूपी में फायदा हुआ है तो वह जंतर मंतर में आरक्षण हटाओं व आरक्षण सुधार के नाम पर जो आंदोलन हो रहा है, इसके नाम पर फिर एक बार यूपी में आरक्षण समाप्त करने या सुधार करने की अफवाह फैलाकर फायदा उठाने की सोच सकता है।यूपी विधानसभा चुनाव २०२७ मे होना है यानी कुछ महीने ही बचे हैं।इस दौरान यदि देश में आरक्षण समाप्त करने या आरक्षण में सुधार का मुद्दा बना रहा तो चुनाव के दौरान में यह एक बड़ा व प्रभावी मुद्दा रह सकता है।कांग्रेस व सपा तो सोच सकते हैं कि हम एक बार इस मुद्दे पर यूपी में फायदे में रहे हैं तो इस बार के चुनाव में भी हम इसका फायदा तो उठा ही सकते हैं।
यूपी विधानसभा चुनाव के पहले आरक्षण का मुद्दा गरमाया हुआ है तो इसकी वजह यह है कि .यूपी में जातिगत व सामाजिक समीकरण ही जीत की कुंजी है।भाजपा की जीत का आधार यहां सवर्ण,गैर यादव,ओबीसी व दलित वोट हैं।इनको तोड़ना विपक्ष के लिए आसान नहीं है लेकिन विपक्ष सोच सकता है कि यदि आरक्षण के नाम पर सवर्ण भाजपा से नाराज होता है तो इससे उनको फायदा हो न हो भाजपा को नुकसान होगा।भाजपा को नुकसान मतलब विकल्प के रूप में मौजूद सपा कांग्रेस गठबंधन को फायदा है।सवर्ण युवाओं का आंदोलन चलता रहा तो सपा और कांग्रेस को पहले की तरह भाजपा आरक्षण विरोधी बताने में आसानी होगी।इससे नाराज सवर्ण व दलितों काे भाजपा से मोहभंग हो सकता है और चुनाव में पहले की तरह बड़ा राजनीतिक नुकसान हो सकता है।जंतर मंतर में सवर्ण युवाओं का आंदोलन भाजपा के लिए एक बड़ी परेशानी है क्योंकि इससे उसके सवर्ण व दलित वोट का नुकसान हो सकता है।इसे भाजपा को समाप्त करना है और इस तरह समाप्त करना है कि सवर्ण भी नाराज न हो और दलित भी नाराज न हो।
जंतरमंतर में युवाओं के आरक्षण सुधार की मांग को लेकर शुरू हुए आंदोलन के बाद अलग अलग दलों के नेताओं की बयानबाजी भी शुरू हो गई है। ज्यादातर लोग तो आरक्षण को बनाए रखने का बयान जारी कर रहे हैं।दलितों की नेता मायावती ने जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण का विरोध किया है।उनका मानना है कि ऐसा कदम देशहित में नहीं होगा।सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा है कि आरक्षण संवैधानिक अधिकार है,यह किसी की इच्छा का विषय नहीं है,आरक्षण सुधार के नाम पर आरक्षण समाप्ति का षड्यंत्र पिछड़े व दलितों के हितों के खिलाफ है। भाजपा व उसके साथी समय समय पर कभी आरक्षण की समीक्षा तो कभी आरक्षण में सुधार तो कभी क्रीम लेयर के नाम पर आरक्षण का विरोध करते हैं।उनका दो टूक कहना है कि आरक्षण था, आरक्षण है और आरक्षण रहेगा। इसी तरह एनडीए सरकार के मंत्री चिराग पासवान का कहना है कि आरक्षण को किसी के कहने से खत्म नहीं किया जा सकता।यह खैरात नहीं संवैधानिक अधिकार है।दुनिया को कोई भी ताकत इस हटा नही सकती।यानी वोटों के ध्रुवीकरण के लिए नेताओं का ध्रुवीकरण शुरू हो गया है।
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